अपनी बहन के ख़िलाफ़ जीत बनी बबीता फ़ोगाट के करियर का टर्निंग प्वाइंट

राष्ट्रमंडल खेलों की स्वर्ण पदक विजेता बबीता ने एक स्थानीय टूर्नामेंट में प्रेरणादायक गीता फ़ोगाट को हराकर चौंका दिया, बबीता का कुश्ती करियर बस यहीं से शुरू हुआ।

लेखक लक्ष्य शर्मा ·

फोगाट बहनों को भारत में हर कोई जानता है, खासकर जब से इन पर बनी फिल्म दंगल रिलीज हुई है, इन्हें हर घर में पहचाना जाता है।

जहां एक तरफ गीता फोगाट (Geeta Phogat) भारतीय रेसलिंग में एक बड़ा नाम है, रेसलिंग में पुरुष खिलाड़ियों का जलवा माना जाता था लेकिन गीता ने लोगों की धारणा बदल दी। कुछ ऐसा ही काम बबीता कुमारी फोगाट (Babita Kumari Phogat) भी कर रही हैं।

लेकिन अपनी बहन के विपरीत, जिसने पहले हरियाणा में लड़कों को दंगल में पटखनी दी, 30 साल की इस पहलवान का मानना है कि उनकी बहन के खिलाफ जीत के बाद ही उनका करियर शुरू हुआ है।

भारत के पूर्व रेसलर संग्राम सिंह (Sangram Singh) के साथ इंस्टा लाइवे में बबीता ने बताया कि जिस दिन मैंने गीता को हराया, उस दिन से लोगों ने मुझ पर ध्यान देना शुरू किया।

 बबीता ने बताया कि “भिवानी में एक रेसलिंग मैच था, जहां मुझे उसे खिताब के लिए कुश्ती करनी थी। यह हमारे अखाड़े की तुलना में एक बहुत ही अलग बाउट था। सामान्य तौर पर वह मुझे आसानी से हरा देती थी, उस दिन मुझे नहीं पता लेकिन मैं उससे बेहतर खेली”

भारत की स्टार रेसलर ने कहा कि अगले दिन यह लोकल अखबार में आया, वापस घर लौटकर काफी मजा आया, सभी गीता के पीछे पड़े हुए थे और उसे चिढ़ा रहे थे कि वह अपनी छोटी सी बहन से हार गई। इस वाक्य ने मुझे काफी आत्मविश्वास दिया कि मैं जीत सकती हूं।

अपनी बहन की तरह बबीता फोगाट ने भी मैट पर कई बड़ी उपलब्धि हासिल की है। साल 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीतकर इंटरनेशनल  सर्किट पर पहली बार नाम कमाया। इसके दो साल बाद भारतीय रेसलर ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल अपने जीता।

कॉमनवेल्थ का कारनामा

छोटी फोगाट ने इसके बाद कुछ और मेडल्स अपनी झोली में डाले लेकिन उनका सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि रही साल 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स (Commonwealth Games) में, जहां उन्होंने 55 किलोग्राम कैटेगिरी में गोल्ड मेडल पर कब्जा किया।

उन्होंने बताया कि मुझे याद है कि उस समय बाउट से पहले मेरे घुटने में चोट थी, वह एक लिगामेंट इंजरी थी। मैंने ग्लासगो में डॉक्टरों से सलाह ली और उन्होंने मुझे तुरंत मैच ना खेलने की सलाह दी।

इसके आगे उन्होंने कहा कि “मैं इस तथ्य को सहन नहीं कर सकी कि मैं ग्लासगो में हूं और प्रतिस्पर्धा में हिस्सा नहीं ले सकता। मुझे उस वक्त लगा कि बाहर होने से बेहतर है कि मैं हार जाऊं, खासतौर पर तब जब आप अपने राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हों।”

भारतीय रेसलर ने कहा कि “मुझे लगता है कि उस ध्वज के लिए खेलना मेरा जुनून है जिसने मुझे उस दिन आकर्षित किया। और आज मेरे पास दुनिया को दिखाने को स्वर्ण पदक है।”