लोगों को लगने लगा था कि मैं लंदन ओलंपिक में जगह भी नहीं बना पाऊंगा: सुशील कुमार

सुशील कुमार की कंधे की एक चोट ने उनकी बेहतरीन फ़ॉर्म पर विराम सा लगा दिया था, जिससे ऐसा लगने लगा था कि वह 2012 ओलंपिक में हिस्सा भी नहीं ले पाएंगे।

अनुभवी भारतीय पहलवान और दो बार के ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार (Sushil Kumar) ने खुलासा किया है कि 2011 में उनके कंधे में लगी चोट के बाद कई लोगों का मानना था कि वह लंदन में होने वाले 2012 ओलंपिक खेलों में हिस्सा नहीं ले पाएंगे और प्रतिस्पर्धा भी नहीं कर पाएंगे।

2008 के ओलंपिक में सुशील कुमार के कांस्य पदक जीतने के बाद नजफ़गढ़ के इस पहलवान का प्रदर्शन बाद के वर्षों में बेहद शानदार रहा, खासतौर पर 2010 में उनका प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा।

कंधे में चोट लगने से पहले उस साल सुशील कुमार ने एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ गेम्स और विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीते थे।

शुरुआत में चोट लगने की वजह से उन्होंने एशियन गेम्स में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया और फिर सुशील कुमार को लगभग पूरे साल ही खेल से दूरी बनाए रखनी पड़ी। इसके बाद 2011 में एक ओलंपिक क्वालिफिकेशन टूर्नामेंट में हिस्सा न ले पाने के बाद ओलंपिक खेलों में उनकी भागीदारी पर भी सवाल उठने लगे।

सुशील कुमार ने सोनी स्पोर्ट्स के फेसबुक पेज पर एक शो के दौरान खुलासा किया, “मैंने अपना दाहिना कंधा घायल कर लिया था और एक समय ऐसा था जब मेरा क्वालिफिकेशन बड़ा सवाल बन गया था। लोग यह सोचने लगे थे कि अगर मैं क्वालिफाई ही नहीं कर पाया तो लंदन ओलंपिक खेलों में पदक जीतने के लिए कैसे जाऊंगा।”

हालांकि, सुशील कुमार ने जल्द ही चीन के ताइयुआन में वर्ल्ड ओलंपिक गेम्स क्वालिफाइंग रेसलिंग टूर्नामेंट में जीत हासिल करके लगातार अपने तीसरे ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफाई कर लिया था।

सुशील कुमार ने बाद में 2012 ओलंपिक में अपने पहले ही दौर में 2008 ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता को मात दी और अंततः लंदन में भारत के लिए रजत पदक जीता।

नामुमकिन को किया मुमकिन

मुश्किलों को बार-बार मात देकर उनसे बाहर निकलना सुशील कुमार के लिए हमेशा से एक आम बात रही है। बीजिंग में हुए 2008 ओलंपिक खेलों में पहले राउंड में उन्होंने एंड्री स्टैडनिक (Andriy Stadnik) को शिकस्त दी। इसके बाद सुशील कुमार को भारत के लिए कांस्य पदक जीतने के लिए 70 मिनट में तीन रेपचेज मुकाबलों को जीतने की जरूरत थी और उन्होंने इस लक्ष्य को शानदार तरीके से हासिल किया था।

सुशील कुमार के प्रतिद्वंदी लियोनिद स्पिरिदोनोव प्लेऑफ बाउट जीतने के लिए एक बहुत ही अनुकूल स्थिति में थे, इस वजह से कई कुश्ती विशेषज्ञ भारतीय पहलवान के जीतने की संभावनाओं को कम ही मान रहे थे।

उन्होंने कहा, “पहले राउंड में जीत हासिल करने के बाद, मेरे प्रतिद्वंदी को ग्रिप पोजीशन का फायदा मिला और उसने दूसरा राउंड जीत लिया। तीसरा राउंड भी ठीक वैसा ही था, जब उन्होंने [लियोनिद स्पिरिडोनोव] टॉस जीता और एक बार फिर से मेरा पैर पकड़ लिया।”

"लेकिन मुझे पता था कि मुझे किसी भी तरह उसकी पकड़ से बचना है और मेरे कोच [सतपाल सिंह] ने भी मुझे अंत तक हार नहीं मानने की सलाह दी थी।”

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2012 ओलंपिक में भारत के फ्लैग-बियरर ने आगे कहा, “कुश्ती विशेषज्ञों का कहना था कि कज़ाकिस्तान के पहलवान के जीतने की संभावना 99 फीसदी थी और मेरे जीतने की महज़ एक प्रतिशत। मैंने उस 1ृ फीसदी उम्मीद में वापसी की और पदक जीता।”

सुशील कुमार के लिए अब आगे क्या?

2016 के ओलंपिक खेलों में हिस्सा नहीं ले पाने के बाद 36 वर्षीय सुशील कुमार अब टोक्यो ओलंपिक के लिए तैयारी कर रहे हैं। 74 किलोग्राम के फ्रीस्टाइल वर्ग में जितेन्द्र कुमार उनकी सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।

एशियाई कुश्ती क्वालिफायर में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए जितेन्द्र कुमार का नाम पहले से ही तय है। ऐसे में सुशील कुमार उम्मीद करेंगे कि उनके हमवतन कॉन्टिनेंटल क्वालिफिकेशन टूर्नामेंट के फाइनल में न पहुंचें।

उस स्थिति में सुशील कुमार को रेसलिंग फेडरेशन (WFI) द्वारा वर्ल्ड ओलंपिक क्वालिफायर के माध्यम से टोक्यो ओलंपिक में क्वालीफाई करने के लिए नेशनल ट्रायल्स में जीत हासिल करने होगी।

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