योगेश्वर दत्त को लिएंडर पेस ने दिखाया था ओलंपिक का सपना

1996 ओलंपिक में लिएंडर पेस के ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने से पहले इस भारतीय रेसलर को ओलंपिक खेलों के बारे में कोई भी अंदाज़ा नहीं था।

योगेश्वर दत्त (Yogeshwar Dutt) ने सात साल की उम्र में जब पहली बार हरियाणा के अपने गांव में ही एक अखाड़े में कदम रखा तो उन्हें ओलंपिक के बारे में बहुत कम ही पता था। वास्तव में बड़े सपने देखने वाले इस बच्चे के मन में एक ही उद्देश्य था कि वह अपने गांव के स्थानीय पहलवान की तरह बड़ा और प्रसिद्ध बन सके, जिनका नाम बलराज था। हालांकि, उन्हें यह भी एक न पूरे होने वाले सपने जैसा लग रहा था। 

योगेश्वर दत्त ने अपने फेसबुक पेज पर सोनी स्पोर्ट्स द्वारा स्ट्रीम किए गए मेडल ऑफ ग्लोरी शो में खुलासा करते हुए कहा, “मैं यह नहीं जानता था कि कैसे मशहूर हुआ जाता है। मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि नेशनल या ओलंपिक क्या थे। मैं बस वहां गया क्योंकि मुझे यह अच्छा लगा।”

जैसे अचानक उनका वास्ता अखाड़े से हुआ, ठीक वैसे ही उन्हें ओलंपिक खेलों की भव्यता का अंदाज़ा हुआ। एक दिन स्कूल में परेशान करने वाले कुछ लड़कों का पीछा करते हुए योगेश्वर दत्त अपने गांव के बाहर के अखाड़े में पहुंच गए। वहां सभी लोग अटलांटा खेलों में लिएंडर पेस को देश के लिए ब्रॉन्ज़ मेडल जीतते हुए देख रहे थे।

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इसके बाद पेस के चर्चे रातोंरात पूरे देश में होने लगे। उन्होंने 16 साल बाद भारत के ओलंपिक पदक के सूखे को समाप्त किया था। बस यह वह पल था जब योगेश्वर दत्त को ओलंपिक खेलों की भव्यता का सही अंदाज़ा हुआ।

अटलांटा खेलों में अपने कांस्य पदक की उपलब्धि के बाद लिएंडर पेस के देश में रातोंरात सनसनी बन जाने के बाद ऐसा हुआ, जो 16 साल बाद भारत का पहला ओलंपिक पदक था।

योगेश्वर दत्त याद करते हुए कहते हैं, "मुझे 1996 में ओलंपिक के बारे में पता चला। मुझे याद है कि जब मैंने लिएंडर पेस (Leander Paes) को टीवी पर देखा तो मैंने अपने पिता से उनके बारे में पूछा। उस समय किसी भी खिलाड़ी को टीवी पर दिखाया जाना बड़ी बात हुआ करती थी।”

चोटों से रुका तरक़्क़ी का सिलसिला

योगेश्वर दत्त अपने सपने को पूरा करते हुए आठ साल बाद ओलंपिक खेलों में अपनी जगह बनाई। उन्होंने पहली बार एथेंस खेलों में हिस्सा लिया, हालांकि अभी पदक जीतने का उनका सपना उनसे काफी दूर था।

2004 के ओलंपिक खेलों का अनुभव लेने के बाद युवा योगेश्वर दत्त बीजिंग खेलों में पूरी तैयारी और परिपक्वता के साथ वापसी की। उन्होंने दूसरी बार ओलंपिक में हिस्सा लेने से पहले तीन कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक और एशियन गेम्स में एक कांस्य पदक जीता।

उन्होंने कहा, “मैंने बीजिंग खेलों के लिए अच्छी तैयारी की थी और क्वार्टर फाइनल तक पहुंचा था। लेकिन मैंने आखिरी 7-8 सेकंड में एक अंक गंवा दिया। तभी मैंने यह सोच लिया था कि मैं अगले ओलंपिक में देश के लिए पदक जरूर हासिल करूंगा।”

हालांकि, उनकी तैयारी को जल्द ही कई चोटों ने बीच में रोक दिया।

योगेश्वर दत्त को 2009 में घुटने की चोट का सामना करना पड़ा और दक्षिण अफ्रीका में उनकी एक सर्जरी हुई। जिसने उनके प्रशिक्षण को छह महीने के लिए रोक दिया। इसके बाद 2010 में पीठ में गंभीर चोट लगी, जिसने उन्हें लंबे समय तक फिर से अखाड़े से बाहर कर दिया।

उन्होंने कहा, “सबसे बड़ी चुनौती चोटों से उबरकर वापसी करना रहा है। एक समय था जब मैं चोट की वजह से लगभग एक साल तक मुकाबला करने में असमर्थ रहा था।”

ओलंपिक सपने के लिए की वापसी

योगेश्वर दत्त ने लंदन में होने वाले 2012 ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर लिया था। उससे पहले उन्होंने 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक और एशियाई चैंपियनशिप से दो स्वर्ण पदक जीते।

हालांकि, इस बार अपना तीसरा ओलंपिक खेलते हुए इस अनुभवी पहलवान को एक मुश्किल भारवर्ग में हिस्सा लेना था, जिसमें दुनियाभर के कुछ शीर्ष पहलवान मौजूद थे।

भारतीय पहलवान ने कहा, “रूस के पांच बार के विश्व चैंपियन बेसिक कुदुखोव (Besik Kudukhov) और पुएर्तो के विश्व चैंपियनशिप के रजत पदक विजेता फ्रैंकलिन गोमेज़ (Franklin Gomez) और ईरान के 2010 के एशियाई चैंपियन मसूद एस्माईलपुर (Masoud Esmaeilpour) के साथ मुझे ग्रुप में शामिल किया गया था।"

लेकिन योगेश्वर दत्त जानते थे कि ओलंपिक में पदक हासिल करने का सबसे अच्छा तरीका केवल अपने प्रतिद्वंदी को हराना ही है और वह इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार थे।

प्री-क्वार्टर फाइनल में बेसिक कुदुखोव से हारने के बाद भारतीय पहलवान को पता था कि उन्हें पदक जीतने के लिए अभी एक और मौका मिलेगा। दत्त ने कहा, “मैं दूसरी बाउट में एक अंक से कुदोखोव से हार गया। लेकिन मुझे पता था कि वह फाइनल में जगह बना लेंगे, क्योंकि वह पांच बार के विश्व चैंपियन थे।

उन्होंने कहा, “मुझे पता था कि ओलंपिक पदक जीतने का यह मेरा आखिरी मौका था। अगले 45 मिनट में मैंने ओलंपिक पदक जीतने के लिए तीन मुकाबले लड़े और तीनों में जीत हासिल की।" रेपचेज राउंड में उत्तर कोरिया के री जॉन्ग-म्योंग (Ri Jong-Myong) को कांस्य पदक दिलाने से पहले योगेश्वर दत्त ने फ्रैंकलिन गोमेज़ और मसूद एस्माईलपुर की चुनौतियों को पार कर लिया।

योगेश्वर दत्त ने कहा, “मैंने 1996 से इसका सपना देखा है, जब लिएंडर पेस ने इसे जीता था।"

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