जीवन में संघर्षों को झेलते हुए आगे बढ़े पैरा तैराक मोहम्मद शम्स आलम शेख  

आलम का पैरालिम्पिक्स में पहुंचने का सपना 

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

जीवन में अक्सर कभी ना कभी हमें एक मुश्किल चुनौती का सामना करना पडता है। इससे हम किस तरह से ​निपटते हैं यह हमारे चरित्र को परिभाषित करता है। कुछ ऐसी ही कहानी है पैरापेलजिक से ग्रसित पैरा तैराक मोहम्मद शम्स आलम शेख की। 34 साल की उम्र में भी उन्होंने अपने पैरालिम्पिक्स में पहुंचने के सपने को नहीं छोड़ा है।

आलम 2018 एशियाई पैरा गेम्स में चौथे स्थान पर रहे थे। 2010 में राष्ट्रीय कराटे चैंपियन भी रहे, लेकिन 24 साल की उम्र में रीढ की हड्डी के निचले हिस्से में ट्यूमर बन जाने से उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया। कई असफल सर्जरी ने उन्हें चलने—फिरने में भी लाचार बना दिया।

जीवन में आये इस मुश्किल वक्त के बारे में शम्स आलम ने ओलंपिक चैनल से बातचीत में कहा, "मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही मुझे रीढ की हड्डी के दर्द की परेशानी होने लगी थी।"

"मुझे एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने और सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत आने लगी। इसके अलावा मेरे बाएं पैर की दूसरी उंगली में झनझनाहट होती थी। मूत्राशय पर मेरा नियंत्रण नहीं रहा। एमआरआई कराने पर पता चला कि मेरी रीढ की हड्डी में एक मामूली ट्यूमर पैदा हो गया है। इस कारण मुझे इसकी सर्जरी करवाने के लिए जाना पड़ा।

"मैं उस समय 2010 में नेशनल कराटे चैंपियन था। इसलिए आशान्वित था कि मैं जल्द ठीक हो जाउंगा। डॉक्टरों ने भी कहा कि आप निश्चित रूप से देश के लिए खेलेंगे, लेकिन अगर आप ऑपरेशन नहीं करवाएंगे तो शायद यह गंभीर हो सकता है।

"दुर्भाग्य से पहली सर्जरी सफल नहीं हुई, क्योंकि डॉक्टर ने ट्यूमर के बजाय कुछ नरम ऊतकों को हटा दिया था। 4-5 महीनों के बाद मैंने एक और एमआरआई करवाई।

"स्कैन से पता चला कि ट्यूमर अभी भी है। यह मेरे एक बड़ा झटका था। इसके बाद मैंने दो बार सोचा कि मुझे क्या करना है। पैसा भी नहीं था क्योंकि मैंने पहले ही इलाज पर करीब 5-6 लाख रुपये खर्च कर दिए थे। तब मैंने मुंबई में राम कृष्ण मिशन अस्पताल तलाश किया जिसमें कम खर्चे पर इलाज हो सके।

उन्होंने कहा कि "वहां के चिकित्सकों ने ट्यूमर तो हटा दिया, लेकिन इसके बाद मैं पैरापैलेजिक निम्नांगों के पक्षाघात से ग्रसित हो गया।"

सर्जरी के बाद आलम ने पैरा-स्विमिंग की जिसके परिणाम उत्साहजनक थे। पिछले वर्षों में उन्होंने इंडियन नेशनल पैरा-स्विमिंग चैंपियनशिप में 15 पदक हासिल किए हैं।

लेकिन मुंबई के धारावी में सफलता हासिल करना उनके लिए आसान नहीं था। धारावी जिसे एशिया की सबसे बड़ी झोपड पट्टी में से एक माना जाता है।

भारतीय पैरा तैराक मोहम्मद शम्स आलम शेख

उन्होंने कहा, "धारावी एक ऐसी जगह है जहां मैंने तैरना शुरू किया। लेकिन यहां आने—जाने की बड़ी परेशानी थी। हर दिन मुझे अपने घर से स्विमिंग पूल तक जाने के लिए किसी ना किसी के सहयोग की जरूरत होती थी। क्योंकि व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वाले के लिए यह जगह बहुत मुश्किल है।"  

"स्विमिंग पूल तक पहुंचने में मैंने कई लोगों की मदद ली। जब मेरा भतीजा या बहन मौजूद नहीं होते तो मुझे किसी और मुझे पूल तक पहुंचाने के लिए कहना पड़ता था। सही में यह काफी मुश्किल था। कई लोग हैं जो विकलांगता के साथ जीवन में एक मुकाम हासिल करना चाहते हैं, लेकिन आवागमन की असुविधा के कारण नहीं कर पाते।"

आलम भी सामाजिक दुर्व्यवहार का शिकार हुए हैं। उन्होंने कहा, "एक रिश्तेदार ने मेरे परिवार वालों से मेरे बारे में कहा कि अगर आपके पास पैसा नहीं है तो आपने उसे क्यों रखा हुआ है। उसे जहर दे दो, लेकिन मेरी मां ने हमेशा मेरा साथ दिया।"

संघर्ष पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय आलम अपनी ऊर्जा को एक बेहतर तैराक बनने के लिए काम में ले रहे हैं।

इंडियन ओपन पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में चार बार के स्वर्ण पदक विजेता ने पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण तकनीकी कोचिंग हासिल की है। वर्तमान में उनका लक्ष्य विश्व चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई करना है।