बॉक्सर मनोज कुमार के ओलंपिक सफर के पीछे लिएंडर पेस का हाथ लेकिन कैसे?

दो बार के ओलंपियन मनोज कुमार को उनके भाई ने उन्हें 1996 अटलांटा ओलंपिक में मेडल जीतने वाली लिएंडर पेस की कटिंग दिखाई थी

भारतीय बॉक्सर मनोज कुमार (Manoj Kumar) कभी ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते, अगर उनके भाई और पहले कोच राकेश कुमार (Rakesh Kumar) ने उन्हें भारतीय टेनिस ऐस लिएंडर पेस (Leander Paes) की तस्वीर के साथ प्रेरित नहीं किया होता।

मनोज किशोरावस्था में भी नहीं थे जब राकेश अपने छोटे भाई को एक शर्त पर प्रशिक्षित करने के लिए सहमत हुए । ये शर्त थी कि अंटलाटा में जिस तरह से लिंएडर पेस ने पदक जीता था उन्हें भी वही कारनामा करना होगा।

मनोज कुमार ने संग्राम सिंह के साथ इंस्टाग्राम लाइव के दौरान कहा कि इसकी शुरुआत 1997 के अंत में हुई या 1998 में। मेरे भाई ने मुझे लड़ाई करते हुए देखा और पूछा कि क्या मैं ठीक से बॉक्सिंग सीखना चाहता हूँ। लेकिन उनकी एक शर्त थी, उन्होंने मुझे लोकल अखबार में लिएंडर पेस की फोटो दिखाई, जिसमें उनके 1996 अंटलाटा ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने की तस्वीर थी। मेरे भाई ने कहा कि पेस ने भारत के लिए ओलंपिक में पहला व्यक्तिगत पदक जीता है।"

मनोज कुमार ने बताया कि "भाई ने मुझसे कहा कि मैं तुम्हें एक ही शर्त पर बॉक्सिंग की ट्रेनिंग दूंगा, अगर तुम मुझसे वादा करो कि तुम भी इस मुकाम को हासिल करोगे। उस दिन के बाद से हम दोनों का रिश्ता ही बदल गया, हम भाई ना होकर कोच और छात्र बन गए। तब से और अब तक हमारा रिश्ता और गहरा हो गया।"

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ओलंपिक मंच का वादा

भाई से किए वादे के बाद मनोज कुमार का पहला कदम ओलंपिक जैसे बड़े मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करना था। साल 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स के स्वर्ण पदक विजेता का ये सपना साल 2012 लंदन ओलंपिक में पूरा हुआ, ठीक उसी प्रकार जिस तरह पेस तिरंगे का प्रतिनिधित्व करते थे।

ओलंपिक में उनके प्रदर्शन की बात करें तो पहले दौर में उनका सामना पूर्व एशियाई मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप के स्वर्ण पदक विजेता तुर्कमेनिस्तान के सेरर हुदैबरडीयेव (Serdar Hudayberdiyev) से हुआ।

मनोज कुमार ने ये मुकाबला 13-7 से जीतते हुए प्री क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई। इस बार उनका सामना उस वक्त के दुनिया के नंबर वन बॉक्सर थॉमस स्टालकर (Thomas Stalker) था। लोकल फेवरेट के सामने मनोज कुमार को 16-20 से हार का सामना करना पड़ा।  हार के बाद भारतीय मुक्केबाज़ ने स्वीकार किया था कि यह मुश्किल काम है।

इस खिलाड़ी ने साल 2016 रियो ओलंपिक में भी देश का प्रतिनिधित्व किया। इस बार भी उनका सफर प्री-क्वार्टर फाइनल में ही थम गया।

मनोज कुमार ने पहले राउंड में लिथुआनियाई मुक्केबाज़ इवाल्डस पेट्रासकस (Evaldas Petrauskas) को हराया लेकिन अगले राउंड में उन्हें स्वर्ण पदक विजेता फ़ज़लिद्दीन गैबनाज़रोव (Fazliddin Gaibnazarov) से हार का सामना करना पड़ा।

अब टोक्यो ओलंपिक में हरियाणा का ये बॉक्सर अपने सपने को पूरा करने के साथ साथ युवा खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा बनना चाहते हैं।

मनोज कुमार ने कहा कि अब, मुझे लगता है कि मैं अपने देश के युवाओं के साथ अपना अनुभव बांट सकता हूं, खुद की ऐकेडमी शुरू करने के पीछे भी यही कारण है। मैं चाहता हूं कि वह अपने देश के लिए पदक जीते।

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