भारत के ओलंपियन मुक्केबाज़ मेहताब सिंह ने 72 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

मेहताब सिंह ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले भिवानी के पहले मुक्केबाज़ थे, जिन्होंने विजेंदर सिंह सहित कई भारतीय मुक्केबाजों को प्रेरित किया, ताकि वे खेल को अपना सकें।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

1972 म्यूनिख ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय मुक्केबाज़ मेहताब सिंह (Mehtab Singh) की मंगलवार को गुरुग्राम के मानेसर में 72 वर्ष की अम्र में निधन हो गया।

हरियाणा के भिवानी जिले से आने वाले मेहताब सिंह इस क्षेत्र से ओलंपिक में खेलने वाले पहले मुक्केबाज़ थे। वो 1971 से 1976 तक निर्विवाद रूप से राष्ट्रीय लाइट हैवीवेट चैंपियन भी रहे और 1974 के एशियन गेम्स में रजत पदक जीता था।

महान मुक्केबाज़ हवा सिंह (Hawa Singh) के साथ, मेहताब को उन अग्रणी लोगों में से एक माना जाता है, जिन्होंने भिवानी को भारतीय मुक्केबाज़ी का 'मिनी क्यूबा' बनने में मदद की।

मेहताब सिंह के ओलंपिक दौरे ने भिवानी की कई पीढ़ियों को बॉक्सिंग रिंग में उतारने के लिए प्रेरित किया, इस क्षेत्र से भारत को कई चैंपियन भारतीय मुक्केबाज़ मिले हैं।

विकास कृष्ण (Vikas Krishan), जितेन्द्र कुमार (Jitender Kumar) और सबसे महत्वपूर्ण बीजिंग 2008 के कांस्य पदक विजेता विजेंदर सिंह (Vijender Singh) जैसे खिलाड़ी भिवानी से ही आते हैं।

मुक्केबाज़ी से संन्यास लेने के बाद मेहताब सिंह ने कई वर्षों तक भारतीय मुक्केबाज़ी को ज़मीनी स्तर के कोच और राष्ट्रीय चयनकर्ता के रूप में काम करना जारी रखा। 1973 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

विजेंदर ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया, “मेहताब सर भिवानी और हरियाणा से मुक्केबाज़ी में पहले ओलंपियन थे। जब हम बॉक्सिंग में शामिल हुए तो वो हमारे लिए प्रेरणा के एक बड़े स्रोत थे। हम हमेशा उनकी तरह बॉक्सिंग करना चाहते थे।”

"यह पूरे खेल बिरादरी के लिए एक बड़ा झटका है।" अर्जुन अवार्डी मुक्केबाज़ राज कुमार सांगवान (Raj Kumar Sangwan) ने कहा कि वो देश के मुक्केबाज़ी सितारों में से एक थे और हमेशा अपनी सादगी के लिए याद किए जाते रहेंगे।

1994 में रिटायरमेंट से पहले मेहताब सिंह ने भारतीय सेना में भी एक कप्तान के रूप में कार्य कर चुके थे।

ओलंपियन का अंतिम संस्कार बुधवार को उनके पैतृक गांव ईशरवाल में हुआ। उनके तीन बेटों ने उन्हें अंतिम विदाई दी।