यूरोपियन तकनीक और भारतीय कौशल के मिश्रण को परफेक्ट रैसीपी मानते हैं हॉकी के दिग्गज बोवेलेंडर  

डच ड्रैग-फ्लिकर हमेशा भारतीय खिलाड़ियों की पासिंग और ड्रिबलिंग क्षमता से प्रभावित रहे  

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

1990 में लाहौर के हॉकी विश्व कप के दौरान नौ गोल दाग कर फ्लोरिस जान बोवेलेंडर सुर्खियों में आ गये थे। यह उनका एक लाक्षणिक प्रदर्शन था जिसने मेजबान टीम को हराकर नीदरलैंड को टूर्नामेंट जीतने में मदद की।

पदकों से अलंकृत करियर में उन्होंने 1996 में अटलांटा ओलंपिक में स्वर्ण और सियोल में 1988 में कांस्य पदक जीता।

वह वर्तमान में भुवनेश्वर में नौसेना टाटा हॉकी अकादमी (NTHA) के उच्च प्रदर्शन केंद्र में मुख्य कोच के रूप में काम कर रहे हैं। वो भारतीय हॉकी के गहन समीक्षक हैं और उन्हें लगता है कि स्वदेशी भाव के साथ-साथ इसमें यूरोपीय तकनीक को शामिल करना सही दृष्टिकोण होगा।

बोवेलेंडर ने कहा,"भारतीय पुरुष टीम के पास कई ऑस्ट्रेलियाई और डच कोच रहे हैं। ऐसे में उन्होंने कुछ यूरोपीय हॉकी के तकनीकी भागों को भी अपनाया है।"

"लेकिन उनके अंदर अभी भी भारतीय भावना मौजूद है। मुझे लगता है कि अगर हम ऐसे ही खेलते रहे, तो यह हॉकी के लिए नीरस होगा। हमें कुछ रोचक खिलाड़ियों की जरूरत है जैसे कि भारतीयों के पास हमेशा होते हैं। मैं भारतीयों के कुशल और शक्तिशाली ड्रिबल को पसंद करता हूं। हालांकि, कभी-कभी यह उतना प्रभावी नहीं होता, जितना होना चाहिए।"

भुवनेश्वर में फ्लोरिस जान बोवेलेंडर

कोरोन वायरस महामारी ने 2020 में खेलों के अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर को बिगाड़ कर रख दिया। उन्हें लगता है कि टोक्यो ओलंपिक में परिणामों से हॉकी प्रशंसकों को आश्चर्यचकित किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, "अंतरराष्ट्रीय हॉकी में पिछले एक साल में शायद ही कोई मैच हुआ हो और जो कुछेक मैच हुए, तो वो भी बिना दर्शकों के हुए थे।"

"मुझे लगता है कि यूरोप में दर्शकों से भरे स्टेडियम में मैच के आयोजन डेढ़ साल बाद या ओलंपिक तक देखने को मिलें। मैं यह देखने के लिए उत्सुक हूं कि ओलंपिक कैसा होगा, क्योंकि आपके पास ज्यादा शीर्ष मैच नहीं हैं। आपको प्रतिद्वंदी के सामने खुद को परखने के लिए शीर्ष मैचों की जरूरत है। ओलंपिक हम में से ज्यादातर के लिए चौंकाने वाला होगा।"

भारत ने चौथे स्थान पर रहते हुए दशक का अंत अपनी सर्वश्रेष्ठ विश्व रैंकिंग के साथ किया। बोवेलेंडर को लगता है कि प्रतिभाओं की तलाश और जमीनी स्तर पर बुनियादी ढांचे में सुधार विकास के दो प्रमुख कारण हैं।

"मुझे लगता है कि पिछले दशक में स्काउटिंग में निश्चित रूप से सुधार हुआ है। कृत्रिम पिचों और अच्छी कोचिंग के साथ खुली अधिक अकादमियों का बड़ा फायदा मिला है। इससे युवाओं को विकसित करने में मदद मिलती है।"

"मुझे लगता है कि पिछले एक दशक में बुनियादी ढांचे में सुधार तेजी से हो रहा है। ताकि प्रतिभा की खोज में बड़ा सुधार देखने को मिले। मैं वहां कुछ बदलाव देख रहा हूं और यह भारतीय हॉकी के लिए अच्छा है।"