मानसिक फिटनेस पर ध्यान केन्द्रित कर रहे टोक्यो कोटाधारी शूटर अभिषेक वर्मा को कभी महसूस नहीं हुई मनोवैज्ञानिक की जरूरत   

वर्मा ने शूटिंग को एक शौक के तौर पर शुरू किया था और वो अभी भी इसे अपना शौक ही मानते हैं 

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

टोक्यो कोटाधारी पिस्टल शूटर अभिषेक वर्मा (Abhishek Verma) अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए वकील बन सकते थे, जो एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं। वह बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी की डिग्री का भी बड़ा फायदा उठा सकते थे, लेकिन इन सबसे ज्यादा उन्हें शूटिंग में खुशी मिली।

वर्मा इस गर्मी में टोक्यो खेलों में ओलंपिक में पदार्पण करेंगे। मानसिक दृढता के लिए अब ज्यादातर एथलीट खेल मनोवैज्ञानिकों का सहयोग ले रहे हैं, लेकिन वर्मा तकनीकी, सटीकता आधारित इस खेल को एक शौक के रूप में ले रहे हैं।

वर्मा ने ओलंपिक चैनल को बताया, "शूटिंग में सबसे महत्वपूर्ण बात मानसिक फिटनेस होती है, लेकिन मुझे खेल मनोवैज्ञानिक की जरूरत नहीं है। मुझे कभी इसकी कमी महसूस भी नहीं हुई, क्योंकि मैंने शुरू से ही शूटिंग को एक शौक के तौर पर लिया है। इससे मुझे खुशी मिलती है। लॉकडाउन के दौरान मैंने मानसिक फिटनेस के अभ्यास पर बहुत ध्यान केंद्रित किया।"

वर्मा ने उंची उड़ान भरने वाले उन किशोरों की तुलना में काफी समय बाद शूटिंग गेम की तरफ रुख किया। जो अब बड़े मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उनके कोच मनोज और साथी निशानेबाजों ने 2015 में एकलव्य शूटिंग रेंज में पहली बार उनकी प्रतिभा को देखा था, लेकिन हरियाणा के निशानेबाज ने बीटेक में डिग्री हासिल करने और फिर लॉ की पढ़ाई पूरी करने तक इसे करियर के रूप में नहीं चुना।

अभिषेक वर्मा ने 28 वर्ष की उम्र में शूटिंग पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया। फोटो साभार: ISSF

30 वर्षीय ने कहा, "मैंने नवंबर 2014 में शौकिया तौर पर शूटिंग शुरू की थी। फिर 2015 में मैंने पिस्टल (शूटिंग) को चुना। मैं हिसार की एकलव्य शूटिंग अकादमी में मनोज सर के निर्देशन में प्रशिक्षण ले रहा था। वो हमें इसके बारे में मूल बातें सिखाते थे। उन्होंने मुझे बताया कि मैं अच्छा कर रहा था। मैं प्रतिस्पर्धा नहीं करना चाहता था, क्योंकि मैंने इसे मजे के लिए शौक के रूप में शुरू किया था। मैं रेंज में पहुंचकर 20-30 शॉट मारने के बाद घर लौट जाता था। ऐसा करते रहने के छह महीने बाद मेरा स्कोर बहुत अच्छा होने लगा और सभी ने मुझे खेल में बने रहने के लिए प्रोत्साहित किया।"

माता-पिता के कहने पर उन्होंने पहले अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की और बाद में सिविल सेवा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का विकल्प चुना।

उन्होंने कहा, "मैं संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा पास नहीं कर सका, तो मेरी मां ने सुझाव दिया कि मुझे लॉ की डिग्री लेनी चाहिए। डिग्री हासिल करने के बाद मैंने 2017 में शूटिंग को गंभीरता से लिया।"

वर्मा ने पहली बार 28 साल की उम्र में 2018 में भारतीय टीम में प्रवेश किया। उन्होंने रैंकों के माध्यम से प्रगति की और एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीता। 2019 में बीजिंग विश्व कप और रियो डी जनेरियो विश्व कप में स्वर्ण पदक जीता।

उन्होंने कहा, "26—27 साल की उम्र मैंने जीवन बदलने वाला फैसला लेते हुए कंप्यूटर साइंस और लॉ डिग्री को दरकिनार करते हुए शूटिंग को करियर के रूप में चुना। शूटिंग ने मुझे और मेरे परिवार को बहुत सम्मान, खुशी और गर्व दिलाया है।"

बीजिंग में हुए विश्व कप में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने पुरुषों की एयर पिस्टल स्पर्धा में भारत का दूसरा कोटा हासिल किया। वर्मा अब अप्रैल से शुरू होने वाली 64वीं राष्ट्रीय चैंपियनशिप के लिए कमर कस रहे हैं।