'पय्योली एक्सप्रेस' के पीछे की मार्गदर्शक शक्ति नाम्बियार को मिलेगा पद्म श्री सम्मान

आखिरकार भारतीय खेलों में नांबियार के योगदान के लिए उन्हें सम्मान देते हुए 72वें गणतंत्र दिवस पर पद्म श्री के लिए चुना गया   

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

72वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 2021 पद्म श्री पुरस्कारों की घोषणा की गई। इसमें खेल जगत के सात खिलाड़ियों को चुना गया। यह सम्मान पाने वाले खिलाड़ियों की सूची में ओ माधवन नाम्बियार का नाम भी शामिल है। 89 वर्षीय अनुभवी एथलेटिक्स कोच के लिए भारतीय एथलेटिक्स में उनके निस्वार्थ योगदान के लिए यह एक उचित सम्मान था।

हालांकि कई लोगों को लगता है कि यह उन्हें बहुत पहले मिलना चाहिए एथल ओएम नांबियार को कोच के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान उस वक्त मिली, जब उन्होंने पीटी उषा को भारत की सबसे महान एथलीटों में से एक के रूप में तैयार किया।

आइए नजर डालते हैं भारतीय कोचिंग के सबसे महान नामों में शामिल नाम्बियार के जीवन और करियर पर।था

नांबियार ने पीटी उषा को 14 साल की उम्र में पशिक्षण दिया था

वायुसेना पृष्ठभूमि से

केरल के कन्नूर में पय्योली के पास एक छोटे से गांव में जन्मे (संयोग से पीटी उषा का जन्म स्थान भी यही है) नांबियार ने स्वाभाविक रूप से एथलेटिक्स का चुनाव किया। वह अपने कॉलेज के दिनों में कोझीकोड के गुरुवायुरप्पन कॉलेज में चैंपियन एथलीट थे। उनके कॉलेज के प्रिंसिपल ने नाम्बियार को सेना में जाने और एथलेटिक में करियर आगे बढ़ाने की सलाह दी थी

इस सलाह को आत्मसात करते हुए नांबियार एक ऐसी यात्रा पर निकले जिसने उनका जीवन बदल दिया और लगभग भारत को ओलंपिक में पदक दिला ही दिया। उन्हें 1955 में चेन्नई के ताम्बरम में आयोजित चयन शिविर से वायु सेना के लिए चुना गया। उन्होंने राष्ट्रीय आयोजनों में सर्विसेज का प्रतिनिधित्व करते हुए सफलता प्राप्त करने के लिए आगे कदम बढ़ाया। हालांकि, उन्होंने कभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व नहीं किया।

कोचिंग की तरफ रुख

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने का सपना पूरा नहीं होने के कारण उन्होंने एथलीट के रूप में अपने करियर को खत्म करते हुए कोचिंग का क्षेत्र चुना। नांबियार अपने सपनों को उनके द्वारा तैयार की प्रतिभाओं के माध्यम से पूरा करना चाहते थे।

उन्होंने पटियाला के राष्ट्रीय खेल संस्थान से कोचिंग डिप्लोमा पूरा किया और सर्विसेज एथलीटों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। कर्नल गोदा वर्मा राजा से हुई आकस्मिक मुलाकात उनके जीवन में एक सुअवसर लेकर आई। केरल में खेल के अग्रणी जी वी राजा ने उन्हें राज्य के एथलीटों को प्रखर बनाने के लिए केरल आने का आमंत्रण दिया।

गृह राज्य में काम करने का एक मौका मिलने के कारण नाम्बियार इस प्रस्ताव को किसी कीमत पर नहीं ठुकराना चाहते थे। इस प्रकार 1970 में उन्होंने केरल खेल परिषद में कोच के रूप में कार्यभार संभाला।

पीटी उषा की खोज

ओम नांबियार और पीटी उषा एक-दूसरे के पर्याय हैं और शिक्षक-विद्यार्थी के बीच का यह अद्भुत संबंध 1976 में बना। नांबियार तब कन्नूर खेल डिविजन में थे। इस दौरान तिरुवनंतपुरम में डिविजन के चयन ट्रायल के बाद आयोजित हुए पुरस्कार वितरण समारोह में उन्होंने उषा को देखा।

वर्ष 2000, में Rediff.com के साथ एक साक्षात्कार में नांबियार ने याद करते हुए कहा, "पहली नजर में उषा के अंदर मुझे, उसकी दुबली शारीरिक बनावट और तेज चाल ने प्रभावित किया था। मुझे विश्वास हो गया था कि वह बहुत अच्छी धावक बन सकती है।"

उषा को नांबियार के साथ प्रशिक्षण करने के लिए चुना गया। उनके बीच भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन करने के लिए एक साझेदारी शुरू हुई।।

अपने कोच माधवन नांबियार के साथ पीटी ऊषा

ओलंपिक में टूटा दिल

नंबियार की छत्रछायां में आने के बाद उषा ने बहुत जल्दी ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल कर ली। उषा ने कोल्लम में 1978 में जूनियर्स की अंतर-राज्यीय प्रतियोगिता में चार स्वर्ण सहित छह पदक जीते। नांबियार के मार्गदर्शन में अपनी प्रगति को जारी रखते हुए उन्होंने 1979 के राष्ट्रीय खेलों और 1980 की राष्ट्रीय अंतर-राज्यीय प्रतियोगिता में कई रिकॉर्ड बनाये।

उन्होंने, 1982 के एशियाई खेलों (100 मीटर और 200 मीटर) में दो रजत पदक और 1983 में कुवैत सिटी में एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता, लेकिन नई दिल्ली में आयोजित 1982 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक से चूक जाना दिल तोड़ गया। इसके बाद उषा और नांबियार ने लॉस एंजिल्स में 1984 ओलंपिक के लिए रणनीति बनाई।

नांबियार ने उषा को सलाह दी कि केरल की अपनी साथी एथलीट एमडी वलसम्मा को नाराज करने की कीमत पर रजत पदक हासिल करने के बाद भी वह 400 मीटर बाधा दौड़ में भाग लें। नांबियार इस बात पर अड़े थे कि उषा को 400 मी बाधा दौड़ करनी चाहिए।

इसका परिणाम यह हुआ कि 'पय्योली एक्सप्रेस' लॉस एंजिल्स 1984 ओलंपिक से पहले एक मजबूत पदक दावेदार के रूप में उभरी। एक गलत शुरुआत के बाद वह एक सेंकड के सौवें हिस्से के दिल तोड़ने वाले अंतर से इतिहास रचने से चूक गईं और चौथे स्थान पर पहुंच गई।

बाद में नांबियार ने मातृभूमि के साथ एक साक्षात्कार में कहा, "ऑस्ट्रेलियाई एथलीट के गिरने के कारण कुछ देर के लिए रोकी गई दौड़ फिर से शुरू हुई। इसकी उसे कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि इस बार उषा की शुरुआत अच्छी नहीं थी। फिर भी मुझे लग रहा था कि वह कांस्य पदक तो जीत ही जायेगी लेकिन, बराबरी की दौड़ में वह चौथे स्थान पर रही। मुझे याद है इस झटके के कारण में ट्रैक पर गिरा और पता नहीं मैं कितनी देर तक इस स्थिति में रही।"पहला द्रोणाचार्य सम्मान

साल 1984 में नाम्बियार के दिल में हुआ निराशा का घाव कभी नहीं भरा, लेकिन इसने उन्हें और उषा को उत्कृष्टता की तरफ बढ़ने से नहीं रोका।उस समय के सर्वश्रेष्ठ एथलेटिक कोचों में से एक के रूप में प्रसिद्ध नांबियार को 1985 में पहली बार द्रोणाचार्य पुरस्कार (भारत में कोच के लिए सर्वोच्च सम्मान) प्राप्त करने वाले तीन नामों में शामिल किया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। जकार्ता में 1986 का एशियाई खेल उषा और नांबियार के लिए और भी बड़ी सफलता लेकर आया। उन्होंने 4 स्वर्ण पदक और एक रजत पदक जीता।

अगली उषा की खोज और सेवानिवृत्ति

1990 में ओम नांबियार ने केरल स्पोर्ट्स काउंसिल से इस्तीफा दे दिया और भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) में शामिल हो गए। लेकिन, दूसरी उषा की खोज करने के लिए 2000 के दशक में वो केरल लौट आए। उस समय उन्होंने कई होनहार एथलीटों जैसे बीना ऑगस्टीन, सुकुमारी, शीबा आदि का मार्गदर्शन किया।

हालांकि, यह एक ऐसी खोज थी जो कभी पूरी नहीं होगी। नांबियार खुद स्वीकार करते हैं कि उषा ने जिस तरह का बलिदान दिया है वो किसी और में मिलना बहुत दुर्लभ था।

वह स्थायी रूप से सेवानिवृत्त होने और अपने गृहनगर में बसने से पहले वो विभिन्न लो प्रोफाइल स्टेंट में मागदर्शन देने जाएंगे। खेल में दिए योगदान के लिए भारत सरकार से मिल रहे पदम् श्री पुरस्कार पाकर ओम नांबियार संतुष्ट हैं।