पैरालंपिक्सः 'स्पोर्ट्स एक्टिविस्ट' और 'असाधारण महिला' दीपा मलिक भारत में एक बदलाव का कर रहीं नेतृत्व  

दीपा मलिक ने ओलंपिक चैनल पर किया एक प्रशासक के रूप में नए अवतार के बारे में खुलासा  

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

अमेरिकी कवि एडविन मार्खम ने कहा था कि "विकल्प नियति पर टिके होते हैं", लेकिन 1999 की गर्मियों के दिनों में दीपा मलिक के पास उस वक्त कोई विकल्प नहीं, जब उन्हें रीढ़ की हड्डी में हुए एक ट्यूमर को निकलवाने के लिए सर्जरी करवानी पड़ी। इससे उनके जीवन को खतरा होने की संभावना भी थी, तो वहीं अगर वह इस सर्जरी के बाद अगर बच भी जाती हैं तो उनके सीने से नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाएगा। उन्हें आगे की जिंदगी व्हीलचेयर पर गुजारनी होगी।

वह भाग्यशाली थी और इस सर्जरी के बाद बच भी गई, लेकिन लगवाग्रस्त हो गई। उस समय भले ही उसके पास कोई विकल्प नहीं था, लेकिन अब उसके पास जीवन के बाकी हिस्से को बेहतर बनाने का विकल्प था। वह अपनी शारीरिक स्थिति को अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर सकती थी या बाधाओं को धता बताकर पुनर्जन्म को चुन सकती थी। जीवन के इस मोड पर उन्होंने छोटी यात्रा का रास्ता चुना और इससे फर्क पड़ा है।

दीपा मलिक ने अपने खेल करियर की शुरुआत 30 साल की उम्र में की, जिस वक्त ज्यादातर एथलीटों का करियर अंतिम पड़ाव पर होता हैं। लेकिन यह उनके रियो पैरालंपिक्स की शॉटपुट स्पर्धा की एफ 53 श्रेणी में स्वर्ण पदक जीतकर भारत के सबसे शानदार पैरालंपिक एथलीट बनने की राह में रोड़ा नहीं बन सका।

वह मुख्य रूप से भाला फेंक स्पर्धा में थीं और वह रियो ओलंपिक में भाला फेंक में ही भारत का प्रतिनिधित्व करने की उम्मीद कर रहीं थी, लेकिन बाद में यह घोषणा की गई कि उन्हें भाला फेंक के स्थान पर शॉट पुट में स्पर्धा करनी है। तीन साल की दृढ़ता के सामने अचानक से धुंध सी छा गई। अब उसके पास एक और विकल्प था कि वह शॉट पुट सीखे या रहने दे। मलिक ने चुनौती का मुकाबला किया और उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है।

हालांकि, एक एथलीट के रूप में दो दशकों के करीब बिताने के बाद उसने एक अलग जिम्मेदारी लेने का फैसला किया और फरवरी 2020 में मलिक को भारत की पैरालंपिक समिति के अध्यक्ष के रूप में चुना गया।

खेल प्रशासन में जाने के पीछे क्या थी प्रेरणा?

मलिक ने ओलंपिक चैनल को बताया, "मैंने ज्यादातर पदक अपने देश के लिए एक जिम्मेदार एथलीट के रूप में जीते हैं। मैंने एशियाई खेल, विश्व चैंपियनशिप जीती तथा रिकॉर्ड भी तोड़े और रियो में पैरालंपिक पदक जीता है। मैंने हमेशा खुद को खिलाड़ी से ज्यादा खेलों के लिए एक कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में माना है, जो एक बदलाव का नेतृत्व कर रहा है। जब भी मैंने पदक जीता तो मुझे लगा कि मैं बदलाव ला सकती हूं। इसने मुझे कुछ नीतियों को बदलने और पैरा-खेल के लिए कुछ जागरूकता पैदा करने के लिए मजबूर करूंगी। इसके पीछे मेरा मकसद था कि खेल जरिये कैसे लोग विकलांगता के साथ सशक्त बन सकते हैं।

मलिक के लिए प्रगति सही दिशा में आगे बढ़ रही थी और उसने इसे आगे जारी रखाः

उन्होंने कहा, "महासंघ एक सकारात्मक बदलाव ला रहा है जहां वे एक एथलीट-केंद्रित दृष्टिकोण लेने और अपनी योजनाओं को एथलीटों को केंद्र में रखते हुए तैयार कर रहा हैं। मुझे लगा कि मैं इसमें योगदान कर सकती हूं। खेल ने जो मुझे दिया मैं इसके जरिये उसे वापस दे रही हूं। एक एथलीट और फिर नेतृत्व करते हुए एक प्रशासक के रूप में भी कुछ बदलाव ला सकती हूं। मैं एक एथलीट के रूप में अपने अनुभव के आधार पर निश्चित रूप से बड़ा योगदान दे सकती हूं, जैसे कि एथलीट क्या चाहते हैं और मैं उनकी आवाज बन सकती हूं।"

उन्होंने आगे बताया, "मुझे एक बार इस पद की पेशकश की जा रही थी, तो यह फासलों को मिटाने का एक अच्छा अवसर था। अगर महासंघ खुद प्रमुख भूमिका में एक एथलीट और एक ऐसे व्यक्ति को मौका देना चाहता है जो सबसे गंभीर विकलांगता की श्रेणियों से आता है तो यह उन्हें और सिस्टम को संवेदनशील बनाता है जो एथलीटों की जरूरत भी है।"

इसके अलावा वह तीन साल के लंबे ब्रेक को नहीं भूली हैं, क्योंकि शॉट पुट को आगामी टोक्यो पैरालंपिक्स में डिस्कस के साथ बदल दिया गया है। वह डिस्कस का प्रशिक्षण ले रही थीं और जकार्ता में 2018 एशियाई पैरा खेलों में कांस्य पदक भी जीता था। लेकिन लगातार चोटों के कारण डॉक्टरों ने उन्हें खेल से दूर रहने की सलाह दी।

उन्होंने इसके बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए कहा, "डिस्कस का अभ्यास करते समय मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर एंटी-ग्रेविटी साइड में झटके नहीं लेता है। जब मैं इसे अपने कंधे की आधी ऊंचाई पर रखती हूं तो मेरी गर्दन के आसपास खिचाव पैदा होता है। मेरी सर्जरी भी गर्दन और वक्ष के बीच वाले हिस्से में हुई थी। बहुत संवेदनशील जगह है। बार-बार गर्दन में चोट लगने के कारण डॉक्टरों ने मुझे नहीं खेलने की सलाह दी। इसलिए मुझे भी खेल से दूर होना पड़ा।"

PCI की अध्यक्ष के रूप में खुद की भूमिका का उनके दिमाग में स्पष्ट खाका तैयार है। वह इसमें मिलने वाली चुनौतियों से भलीभांति परिचित हैं और उन्हें माथे पर लेने के लिए भी तैयार है। जबकि वर्तमान में महामारी की स्थिति ने उसके लिए और भी जटिल समस्याएं खड़ी कर दी हैं। उत्कृष्टता के लिए उनके दृढ संकल्प ने विपत्ति को भी एक और अवसर में बदलने में मदद की है।"मेरा करियर चुनौतियों से भरा रहा है। यह पहला बाइकर, पहला तैराक, पहली रैली-आईएसटी, एथलेटिक्स में प्रथम एशियाई पदक विजेता, प्रथम विश्व चैम्पियनशिप और अब मैं महासंघ की पहली एथलीट अध्यक्ष बनी हूं। वह भी ऐसे चुनौतीपूर्ण समय पर, जिसकी पहले कोई दूसरी मिसाल नहीं है। मुझे पानी पीने के लिए खुद ही कुंआ खोदना था। इससे बहुत कुछ सीखने को मिला।"

पहली बार नहीं मलिक ने कई बार बदलाव को एक सकारात्मक अनुभव में के रूप में बदलने में कामयाबी हासिल कीः

"मुझे खुशी है कि हम समय का सदुपयोग कर सकते हैं और वेबिनार के माध्यम से अपने खेल के चारों ओर विज्ञान का निर्माण कर सकते हैं। ये वेबिनार एक रेफरल कोर्सबुक की तरह भी बन गए हैं, क्योंकि प्रत्येक ने कुछ ना कुछ अपलोड किया है और प्रत्येक वेबिनार में विज्ञान के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी दी गई हैं जिनसे लोग परिचित नहीं हैं। इसमें बहुत सारे कोच रुचि तो रखते हैं, लेकिन वे इसके बारे में नहीं जानते कि वास्तव में यह क्या है। यह भाला फेंक और शॉट पुट जैसा ही है, लेकिन उनसे थोड़ा अलग है।"

"इसमें विकलांगों के अनुसार विभिन्न चिकित्सा श्रेणियों हैं। विभिन्न तरह के सहायक उपकरण, फेंक उपकरण के आसपास के नियम, एक ही इवेंट को विभिन्न श्रेणियों में कैसे आयोजित किया जाता है। हमने वेबिनार बनाए और इन्हें तैयार के लिए रखा। इसमें चोट प्रबंधन, आहार, उचित मानसिक सेहत पाठ्यक्रम पर बातचीत हुई है। हमने घरों पर व्यायाम करने वाले एथलीटों के वीडियो भी डाले हैं जो अन्य एथलीटों को प्रेरित करते हैं। इसलिए यह मेरे लिए एथलीटों और विभिन्न राज्य निकायों से जुड़ने में समय का अच्छा सदुपयोग था।"

लेकिन, भूमिका में आये बदलाव के कारण वह ज्यादातर वक्त में एक कमरे की चार दीवारों से घिरी रहती हैं। अध्यक्ष होने के नाते उन्हें बैठकें लेनी होती हैं, नीतियां बनानी पड़ती हैं, सरकारी अधिकारियों से मिलना और कई अन्य जिम्मेदारियां निभानी होती हैं जो उन्हें ट्रैक से दूर कर देती हैं।

फिर भी, मलिक अपनी नई भूमिको को लेकर खुश है, क्योंकि उनका मानना है कि वह अपनी क्षमता के माध्यम से कई एथलीटों को उनके कमरों से बाहर ला सकती हैं।

उन्होंने कहा, "यह बहुत ही विडंबनापूर्ण है कि विकलांगता से योग्यता हासिल करने तक की यात्रा तब शुरू हुई, जब हर किसी ने मुझे से कहा कि मेरा जीवन एक कमरे में खत्म हो जाएगा। मैं कभी भी कमरे से बाहर नहीं जा पाऊंगी। तब मैंने कहा कि मैं एक कमरे में बंद होकर नहीं रहूंगी और बाहर निकल कर रहूंगी। चाहे वह तैराकी हो, बाइक चलाना या रैलिंग करना हो, मैं हमेशा मैदान पर रहती थी। लेकिन अध्यक्ष की जिम्मेदारी ने मुझे वापस एक कमरे में बैठा दिया है। मुझे बाहर के कई लोग आकर मिलते हैं। इसलिए चाहती हूं कि मैं अंदर रहकर बाहर वालों को कुछ दे सकूं। वहां रहकर में उन्हें उपर उठाने के साथ और सशक्त बनाने में मदद कर सकती हूं।"

मलिक ने एक एथलीट के रूप में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और मैदान में किए कारनामों के साथ एक असाधारण महिला रही हैं। रियो से पहले वह खेलों की दौड़ में खुद को तैयार करने में व्यस्त थी और अब उनके पास टोक्यो के लिए कमर कसने वाली पूरे भारतीय एथलीटों के दल की जिम्मेदारी है।