स्कीट शूटिंग को भारत में बढ़ावा नहीं मिलने के पीछे अंगद बाजवा ने बताया वित्तीय पहलू को जिम्मेदार   

स्कीट शूटर बाजवा के अनुसार एक शॉटगन के असेम्बल पर खर्च होते हैं 7 लाख रुपये

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

भले ही निशानेबाजी ने भारत के लिए बहु-खेल स्पर्धाओं में कई पदक हासिल किए हों, लेकिन स्कीट शूटिंग के क्षेत्र में देश इतना आगे नहीं बढ़ पाया।

टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाले 15 भारतीय निशानेबाजों में से केवल दो ही स्कीट में प्रतिस्पर्धा करेंगे। 25 वर्षीय अंगद बाजवा इनमें से एक हैं जिन्हें भारत में स्कीट शूटिंग के भविष्य के रूप में देखा जाता है। उन्होंने निशानेबाजी की इस स्पर्धा को 2015 में गंभीरता से लिया, लेकिन पिछले पांच वर्षों में उन्होंने इसमें तेजी से प्रगति की है। 

बाजवा ने बोर्डिंग स्कूल के दिनों में पिस्टल शूटिंग को शौकिया तौर पर शुरू किया था। बाद में लंदन में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने इसे करियर रूप में चुना।

बाजवा ने ओलंपिक चैनल को बताया, "बोर्डिंग स्कूल में रहते हुए मैं पिस्टल शूटिंग करता था। शुरुआत में यह मुझे ज्यादा पसंद नहीं था। यह शौकिया तौर पर शुरू किया था। फिर जब एक बार मैंने क्वालीफाई किया, तो मुझे अपनी बंदूक मिली। पता चला कि यह ओलंपिक का हिस्सा है। इसके बाद स्थिति बदल गई।" 

"मुझे लगा कि यह मेरा लक्ष्य है। मैं इसके लिए अपना सर्वश्रेष्ठ शॉट देना चाहता हूं। मैंने जूनियर टीम के लिए अच्छे स्कोर की शूटिंग शुरू की। शिक्षा भी बेहद जरूरी थी, इसलिए मैंने लंदन के एक विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। पहले साल वहीं पर इसकी भी तैयारी की। जब मैंने वहां के राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तोड़ा, तो लगा कि मुझे यही करना चाहिए और यह मेरा लक्ष्य बन गया। हालांकि यह समझ पाना मुश्किल था कि मुझे शूटिंग करनी है या पढ़ाई या फिर दोनों साथ करनी चाहिए। इस कठिन निर्णय में उस समय मेरे पिताजी ने मेरा साथ दिया।"

"इसलिए मैंने UGC छोड़ दिया और भारत लौट आया। 2015-16 के आसपास मैंने गंभीरता से प्रतिस्पर्धा करना शुरू कर दिया, जिसका सकारात्मक परिणाम भी मिला।" 

पिस्टल या एयर राइफल स्पर्धा के विपरीत स्कीट शूटिंग ने भारत की युवा प्रतिभाओं को ज्यादा आकर्षित नहीं किया। अभी भी यह देशभर में सभी लोगों के लिए सुलभ नहीं है। 

अनुभवी बाजवा का कहना है कि, "इस पर होने वाला खर्च इसका एक कारण हो सकता है। एक शॉटगन को असेम्बल करने में करीब 7 लाख रुपये की लागत लगती है। इतना ही नहीं गोला-बारूद के लिए कम से कम 15,000 रुपये की जरूरत होती है। ऐसे में यह उन निशानेबाजों के लिए खरीदना मुश्किल है जो कोर टीम का हिस्सा नहीं हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि यह खेल बहुत महंगा है।"

"कोई भी खेल हो, अगर आप उसमें सबसे अच्छा बनना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पैसे खर्च करने होंगे। मैं भाग्यशाली हूं कि पहले मुझे ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट (OGQ) और अब टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) का सहयोग मिला। ऐसे में ज्यादा से ज्यादा एथलीटों की मदद के लिए कॉरपोरेट्स घरानों के इसमें सहयोग की जरूरत है।"

निजी शूटिंग रेंज में अभ्यास करते अंगद बाजवा

उन्होंने कहा, "अगर राइफल, पिस्टल थोड़े सस्ते होते हैं तो इन स्पर्धाओं में ज्यादा से ज्यादा लोग भागीदार होते। इसकी कीमत करीब 4-5 लाख रुपये है। अगर आपको इसका स्टॉक करने की जरूरत है, तो भी मॉडल के आधार पर इनकी कीमत 1-2 लाख रुपये होती है। यह एक बार का खर्च है। इसके बाद सरकारी सहायता की जरूरत होती है जो अगर मिल जाये तो यह बहुत बड़ी राहत देती है।"

उन्होंने कहा, "दूसरा गोला-बारूद की उपलब्धता है, जिस पर हर साल न्यूनतम 15,000 रुपये तक का खर्चा आ सकता है। अगर आप टीम का हिस्सा नहीं हैं तो आपको पर्याप्त गोला-बारूद नहीं मिलता है।"

बाजवा ने दोहा 2019 में एशियाई चैम्पियनशिप में शानदार प्रदर्शन के साथ टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर लिया है। बाजवा ने हमवतन मैराज अहमद खान को हराया। अब वो स्वर्ण पदक के लिए शूट-ऑफ में टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे।

उन्होंने 8वीं एशियन शॉटगन चैंपियनशिप में 60 में से 60 एकदम सही शॉट भी लगाए, जिससे उन्हें वर्ल्ड रिकॉर्ड स्कोर के साथ गोल्ड मेडल हासिल करने में मदद मिली।

भारत के पहले महाद्वीपीय स्कीट स्वर्ण पदक विजेता बाजवा टोक्यो ओलंपिक से पहले इटली या साइप्रस में प्रशिक्षण लेना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिलेगी। क्योंकि नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कोरोना महामारी के कारण नो-फ्लाई पॉलिसी लागू की हुई। इस कारण वो प्रशिक्षण के लिए विदेश नहीं जा सकते।