प्रेरणा से ओत-प्रोत है बैडमिंटन खिलाड़ी श्रीकांत किदांबी की सफलता का सफर 

बेहद ही दिलचस्प रहा है भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी श्रीकांत किदांबी अब तक का खेल सफर

लेखक अरसलान अहमर ·

आंध्र प्रदेश के एक मध्यम वर्गीय किसान परिवार से ताल्लुख रखने वाले भारतीय शटलर श्रीकांत किदांबी को शुरू से ही खेल से लगाव था। बाकी भारतीयों की तरह उन्होंने भी अपने खेल की शुरुआत क्रिकेट से ही की। लेकिन जब उनके गुंटूर जिले में एक म्यूनिसिपल स्टेडियम बना तो उनका बैडमिंटन के प्रति लगाव बढ़ने लगा। यह वह समय था जब श्रीकांत और उनके भाई नंदागोपाल को कई सुविधाओं से लैस नए स्टेडियम के निर्माण ने बैडमिंटन खेलने के लिए प्रेरित किया। दोनों भाईयों के बैडमिंटन के प्रति प्यार और निष्ठा को देखते हुए उनके पिता ने एक राज्य स्तरीय चैंपियन सुधाकर रेड्डी की निगरानी में उन्हें बैडमिंटन की कोचिंग देने की सोची।

अपने कोच सुधाकर रेड्डी से बैडमिंटन की बारीकियां सीखने के बाद श्रीकांत का चयन आंध्र प्रदेश की स्पोर्ट्स अकादमी में हो गया और वह विशाखापट्नम में रहने लगे। अकादमी के अपने शुरूआती दिनों में श्रीकांत डबल्स खिलाड़ी के तौर पर खेले और उन दिनों उन्होंने कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स जैसी प्रतियोगिताओं में युगल जोड़े के रूप में भाग लिया।

गोपीचंद ने तराशा किदांबी नाम का हीरा

जूनियर लेवल में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद दिसंबर 2009 में श्रीकांत को उनके पिता पुलेला गोपीचंद अकादमी में लेकर आए और यहां से उनके बैडमिंटन का एक नया अध्याय शुरू हुआ। कहा जाता है गोपीचंद अकादमी में जाने के बाद श्रीकांत में चौंकाने वाले परिवर्तन हुए। शुरुआत में अकादमी में उन्हें युगल और मिश्रित युगल शटलर के तौर पर ही ट्रेनिंग दी गई और इस दौरान उन्होंने जूनियर लेवल पर अपने प्रदर्शन से सभी को प्रभावित भी किया। उनके शानदार खेल को देखते हुए गो-स्पोर्ट फाउंडेशन ने उन्हें स्कालरशिप के लिए चुना। इसके बाद उनके कोच गोपीचंद ने उन्हें डबल्स की जगह सिंगल्स पर ध्यान देने को कहा। ऐसा करना श्रीकांत के लिए आसान तो नहीं था लेकिन कोच गोपीचंद के विश्वास ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

श्रीकांत की सफलता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि साल 2012 में 240वीं रैंक से शुरुआत करने के बाद मई 2013 में उनका विश्व के टॉप 13 खिलाड़ियों में शुमार हो चुका था। इसके बाद साल 2013 में शुरू हुई भारतीय बैडमिंटन लीग में उन्होंने बेहतरीन खेल का मुज़ाहिरा पेश किया और कई दिग्गजों से अपने खेल की वाह-वही लूटी। इस लीग के दौरान दुनिया के नंबर एक शटलर ली चोंग वेई के कोच टाई जैको श्रीकांत से ख़ासे प्रभावित हुए और उन्हें भविष्य का खिलाड़ी करार दे दिया।

जब किदांबी ने डैन को दी मात

साल 2014 में 21 वर्षीय श्रीकांत का सामना हुआ बैडमिंटन की दुनिया के दिग्गज शटलर ली डैन से। मौक़ा था चाइना ओपन सुपर सीरीज का फाइनल। श्रीकांत और भारत दोनों के लिए यह मुकाबला बेहद ही ख़ास था क्योंकि इस इवेंट के फाइनल में पहुंचने वाले श्रीकांत पहले भारतीय पुरुष शटलर थे। इस मुकाबले से पहले सट्टा बाज़ार हार-जीत को लेकर गरम नहीं था बल्कि इस बात को लेकर चर्चा ज़ोरों पर थी कि 21 वर्षीय श्रीकांत दुनिया के सभी प्रमुख ख़िताब अपने नाम करने लेने वाले ली डैन के सामने कितनी देर तक टिक पाएंगे। लेकिन श्रीकांत ने सभी खेल पंडितों के कयासों पर उस समय विराम लगा दिया जब उन्होंने बैडमिंटन की दुनिया के दिग्गज खिलाड़ी ली डैन को दो सीधे गेमों में मात देते हुए चाइना ओपन सुपर सीरीज़ अपने नाम की। यक़ीनन श्रीकांत के लिए यह ऐतिहासिक जीत ज़रूर थी लेकिन इससे पहले भी कई बड़ी जीत अपने नाम दर्ज करके वह बैडमिंटन की दुनिया में अपने नाम का आगाज़ कर चुके थे।

लगातार जीत से रैंकिंग में हुआ सुधार

चाइना ओपन की जीत के बाद से ही श्रीकांत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 2015 में स्विस ओपन ग्रैंड प्रिक्स गोल्ड में शीर्ष स्थान प्राप्त करते हुए उन्होंने अपनी फॉर्म को बरक़रार रखा। कुछ ही महीनों बाद हुई 2015 इंडियन सुपर सीरीज़ में भी श्रीकांत कुछ ऐसा ही प्रदर्शन ज़ारी रखते हुए विजेता बने। इन जीतों का ही नतीजा रहा कि वह पुरुषों की बीडब्लूएफ रैंकिंग में तीसरे पायदान पर पहुंच गए जिसकी वजह से वह 2016 रियो ओलंपिक गेम्स के लिए क्वालीफाई कर गए।

रियो ओलंपिक में शुरूआती दो जीत के साथ श्रीकांत ने ग्रुप स्टेज को पार कर लिया। क्वार्टरफाइनल में उनका मुकाबला एक बार फिर से ली डैन से हुआ। पहले गेम में श्रीकांत को 6-21 से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि शानदार वापसी करते हुए भारतीय शटलर ने दूसरा गेम 21-11 से अपने नाम करके भारतीय उम्मीदों को जीवित रखा। तीसरे और निर्णायक गेम में कांटे का मुकाबला हुआ लेकिन आख़िर में जीत चीन के अनुभवी खिलाड़ी के हाथ लगी। तीसरा गेम 21-18 से जीतते हुए ली डैन ने इस मैच को अपने नाम कर कर लिया।

श्रीकांत किदांबी 

शानदार रहे हैं पिछले कुछ वर्ष

अगर रियो ओलंपिक से पहले की बात करें तो श्रीकांत ने साउथ एशियन गेम्स में शानदार खेल दिखाते हुए पुरुष सिंगल्स और डबल्स में गोल्ड मेडल जीता। साल 2016 में ही जापान ओपन के एक मुकाबले के दौरान उनके टखने में चोट लग गई थी। उनकी यह चोट इतनी गंभीर थी कि श्रीकांत को तक़रीबन एक साल तक बैडमिंटन कोर्ट से दूर रहना पड़ा था। साल 2017 में शानदार वापसी करते हुए श्रीकांत ने सिंगापुर सुपर सीरीज़ के फाइनल में जगह बनाई लेकिन ख़िताबी मुकाबले में उन्हें हमवतन साईं प्रणीत से शिकस्त मिली।

इसके बाद जून 2017 में श्रीकांत ने इंडोनेशिया सुपर सीरीज़ प्रीमियर का खिताब अपने नाम करते हुए एक सप्ताह बाद ही ऑस्ट्रेलियन ओपन सुपर सीरीज़ जीतकर अपनी वापसी का डंका बजा डाला। ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया के साथ श्रीकांत ने इसी साल डेनमार्क और फ्रांस ओपन में भी पहला स्थान प्राप्त किया।

इन जीतों के बलबूते श्रीकांत साल 2018 की शुरुआत में बीडब्ल्यूएफ की पुरुष रैंकिंग में शिखर पर पहुंचे। इसी साल श्रीकांत ने 2018 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीतकर एक बार फिर अपने हुनर का सबूत पेश किया।

जुलाई 2019 तक 26 वर्षीय श्रीकांत किदांबी पुरुषों की बीडब्लूएफ रैंकिंग में 10वें स्थान पर काबिज़ हैं और टोक्यो 2020 में क्वालीफाई करने के लिए पूरी तरह से तैयार नज़र आ रहे हैं। टोक्यो ओलंपिक में अगर यह शटलर भारतीय उम्मीदों पर खरा उतरता है तो इसमें किसी को कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।