रेसलिंग

एक पहलवान जिसे हराना असंभव था

वर्ष 1964 के अक्टूबर महीने में टोक्यो ने पहली बार ओलिंपिक खेलों की मेज़बानी करि थी और हम आपको बताएंगे उस प्रतियोगिता के कुछ ऐतिहासिक क्षण जो 56 साल बाद आज भी याद किये जाते हैं। इस बार हम आपको बताएंगे WATANABE Osamu के अद्भुत करियर की कहानी।

पहले की कहानी

WATANABE Osamu ओलिंपिक इतिहास में सर्वश्रेष्ठ पहलवानों में से एक माने जाते हैं।

WATANBE का जन्म जापान के वस्सामु शहर में 21 अक्टूबर 1940 को हुआ था और वह एक पत्थर विक्रेता के घर में बड़े हुए। बहुत छोटी आयु से उन्होंने अपने पिता की सहायता 50 किलो के पत्थर उठाने में कर दी थी। थोड़े समय के बाद उनके पिता स्वास्थ बिगड़ने के कारण WATANBE की माँ ने घर का भार संभाला और एक टोफू की दुकान खोल ली। उस दुकान में वह सोया बीन को पत्थर से पीसते थे और इस वजह से उनकी शक्ति बढ़ गयी।

शुरुआत में WATANBE सूमो पहलवान बनना चाहते थे लेकिन अपने छोटे आकार के कारण उन्होंने फ्रीस्टाइल पहलवानी शुरू करि और होकाईडो शिबेटसु हाई स्कूल में भर्ती हो गए। इसी दौरान साल 1956 के मेलबोर्न ओलिंपिक खेलों में जापान और होकाईडो के ही निवासी पहलवान IKEDA Mitsuo ने पुरुषों कि 73 किग्रा प्रतियोगिता में स्वर्ण जीता।

इस स्वर्ण जीत ने WATANBE को प्रेरित किया और उन्होंने निर्णय लिया कि वह ओलिंपिक खेलों में भाग लेना चाहते हैं।

यह सफर आसान नहीं था और वह रोम में होने वाले 1960 ओलिंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाए। जब जापान की खेल चयन समिति ने उनके स्थान पर SATO Tamiji को चुना तो 20 वर्षीय WATANBE ने टोक्यो 1964 खेलों को अपना लक्ष्य बनाया।

टोक्यो 1964 खेलों की तैयारी करने के लिए WATANBE ने महान पहलवान HATTA Ichiro को अपना कोच बनाया। Ichiro की कड़ी और चुनौतीपूर्ण अभ्यास प्रणाली हर किसी के लिए नहीं थी।

एक बार Ichiro ने WATANBE को शेर से आँख मिलाने को कहा और थोड़ी देर के लिए पिंजरे में भी डाल दिया था।

टोक्यो में होने वाले 1964 ओलिंपिक से दो साल पहले WATANBE ने अपनी पहली अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और मैट पे कदम रखने के पहले क्षण से ही वह सर्वोच्च स्तर पर प्रदर्शन दिखाने लगे। वर्ष 1962 में हुई एक प्रतियोगिता में उन्होंने छह मुकाबलों में हिस्सा लिया और सारे 10 मिनट के अंदर जीत लिए।

WATANBE ने 1962 और 1963 विश्व चैंपियनशिप के 63 किग्रा वर्ग में स्वर्ण अपने नाम किया।

Osamu WATANABE

अहम् क्षण

टोक्यो ओलिंपिक खेलों में WATANBE स्वर्ण जीतने के प्रबल दावेदार थे और उन्होंने सभी प्रतिद्वंदियों को ध्वस्त कर दिया।

स्वर्ण जीतने का दबाव WATANBE पर था लेकिन उनके आत्मविश्वास ने सबको चौंका दिया। साल 2019 में सपोनिची से बात करते हुए, WATANBE ने कहा, 'अगर आप ट्रायल के बारे में सोचें और मैंने क्या सहा, हार की संभावना ही नहीं थी।'

उन्होंने अपने पहले तीन मुकाबलों में प्रतिद्वंदियों को मैट पर पिन करने के बाद फॉल से जीत लिए और आखरी दौर में अंतिम के तीन पहलवानों के बीच राउंड रोबिन खेला गया। WATANBE ने 1960 रोम ओलिंपिक खेलों के रजत पदक विजेता Stancho Ivanov को हराया और उसके बाद उनके और स्वर्ण के बीच एक पहलवान थे - सोवियत संघ के Nodar Khokhashvili।

अपने करियर की 186वीं जीत के साथ WATANBE ने स्वर्ण पदक भी अपने नाम कर लिया।

सासाकावा खेल संस्था से 2012 में बात करते हुए, उन्होंने कहा "स्वर्ण पदक जीतना मेरे जीवन का सर्वश्रेष्ठ क्षण था।"

टोक्यो में हुए ओलिंपिक खेल WATANBE के पहले और अंतिम थे लेकिन उस प्रतियोगिता में उनका प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ था।

टोक्यो 1964 ओलिंपिक खेलों बाद 23 वर्षीय WATANBE ने 186 लगातार जीत और शून्य पराजय के रिकॉर्ड के साथ सन्यास लिया। वह पहले ओलिंपिक चैंपियन बने जिन्होंने बिना एक भी पॉइंट गंवाए खेल को अलविदा कहा।

Osamu WATANABE

आगे की कहानी

ओलिंपिक खेलों के बाद WATANBE ने डेन्ट्सु नाम की अंतर्राष्ट्रीय विज्ञापन और जनसम्पर्क कंपनी के साथ जुड़ गए लेकिन 1970 में उन्होंने सन्यास से बहार आकर जापान में हो रही एक प्रतियोगिता में भाग लिया और अपना 187वां मुकाबला जीत लिया।

WATANBE ने 47 की आयु में सन्यास से बाहर आकर एक बार और जापान के लिए ओलिंपिक खेलों में भाग लेने का प्रयास किया लेकिन सोल में होने वाले 1988 खेलों के पहले उन्हें चोट लग गयी।

उन्हें डॉक्टर और विशेषज्ञों ने कहा कि अगर उन्होंने इस चोट के साथ वह खेले तोह उनकी मृत्यु भी हो सकती है पर WATANBE को इस बात से कोई फर्क पड़ा।

ऑल जापान पहलवानी चैंपियनशिप में WATANBE ने अपना पहले दो राउंड जीते लेकिन तीसरा हार गए और इसके साथ ही उनकी जीत की श्रृंखला का 25 वर्ष बाद अंत हो गया।

अंत में WATANBE का करियर रिकॉर्ड 189-1 पर समाप्त हुआ और अपने ओलिंपिक स्वर्ण के 56 साल बाद वह आज भी जिम जाते हैं।