विकास कृष्ण को कभी मुक्कों से डर लगता था लेकिन मां की वजह से वह आज हैं दिग्गज मुक्केबाज़

वेल्टरवेट मुक्केबाज़ी स्टार अपनी सफलता का श्रेय मां को दिया और कहा कि उन्हीं की बदौलत वह आज इस मुक़ाम पर हैं

विकास कृष्ण (Vikas Krishan) के पिता ने इस खिलाड़ी का दाख़िला बॉक्सिंग एकेडमी में करवाया लेकिन वह उनकी मां थी, जिन्होंने कठिन समय में उनका मनोबल ऊंचा रखा।

दो बार के ओलंपियन और वर्ल्ड एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप के पदक विजेता ने खुलासा किया कि उनकी माँ का ही प्रोत्साहन था जिसने उन्हें एक सफल मुक्केबाज़ बनने में मदद की। विकास ने फर्स्टपोस्ट से बातचीत के दौरान बताया कि “जब भी मैं ज्यादा थक जाता था या मुझे चोट लग जाती थी तब भी मेरी मां ने मुझे हार नहीं मानने दी।’’

इस बॉक्सर ने बताया कि “मैं कभी कभी जब घर पर खून से सना आता तब भी मेरी मां घबराती नहीं थी बल्कि वह कहती थी कि ठीक हो जाएगा, आगे बढ़ो और कल हार्ड हिट करना।”

इसके अलावा उन्होंने कहा कि “कई मौके आए जब मैंने सोचा कि मैं हार मान लूं और जिंदगी में और कुछ कर लूं लेकिन मेरी मां ने कभी ऐसा नहीं होने दिया। इसके लिए मैं उनका आभारी हूं।”

वेल्टरवेट बॉक्सिंग स्टार ने 10 साल की उम्र में मुक्केबाज़ी शुरू की क्योंकि उनके पिता पहले उन्हें मजबूत बनाना चाहते थे। वहीं उन्होंने खुलासा किया कि शुरुआती दिनों में भिवानी बॉक्सिंग क्लब में उन्हें डर दूर करने में काफी समय लगा।

विकास ने बताया कि “शुरू में हिट करना वाकई मुश्किल था। इसके साथ ही मुक्का मारना काफी तकलीफ़ दायक था।”

इसके अलावा भारतीय बॉक्सर ने बताया कि “मुझे मुक्केबाज़ी का आनंद लेने में एक साल का वक्त लग गया, जाहिर तौर पर मुझे रिंग में घूंसा मारा जाता था लेकिन जब मैंने जवाबी मुक्केबाज़ी शुरू की तो मुझे काफी मजा आने लगा। धीरे धीरे मुझ में मारने की आदत हो गई और फिर सब सही हो गया।”

बॉक्सिंग की मानसिकता को तोड़ना

कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स के गोल्ड मेडलिस्ट विकास कृष्ण के लिए बॉक्सिंग हमेशा स्वाभाविक रूप से आई। ‘दी इंडियन टैंक’ के नाम से मशहूर विकास कृष्ण ने अमेरिका की बॉक्सिंग प्रचार कंपनी के साथ साथ अनुबंध किया और अपने पहले दोनों पेशेवर मुक़ाबलों में जीत हासिल की।

इसके बाद ओलंपिक के लिए उन्होंने एक बार फिर एम्चोयर बॉक्सिंग में लौटने का फैसला किया। एशियन बॉक्सिंग ओलंपिक क्वालिफिकेशन के माध्यम से उन्होंने तीसरी बार ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया।

विकास कृष्ण का मानना है कि एक फाइटर का जन्म कुछ कर दिखाने की प्रवृति के साथ होता है। इसके अलावा उन्हें लगता है कि बॉक्सर की मानसिकता बनाने में उसके परिवार का भी अहम योगदान होता है।

69 किलोग्राम कैटेगिरी के इस बॉक्सर ने कहा कि “शुरुआती दिनों में किसी भी बच्चे में डर स्वभाविक होता है, ये परिवार की ज़िम्मेदारी है कि वह डर को दूर कर उसे मजबूत करे।”

इसके अलावा उन्होंने कहा कि “अगर मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे मुक्केबाज़ी करें तो मैं अपनी इच्छा पूरी करने के बजाय उन्हें धीरे-धीरे खेल में शामिल करूंगा। मैं उनके मन में खेल के बारे में एक जिज्ञासा विकसित करूंगा।”

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