जफर इकबाल ने भारतीय हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को बताया खेल इतिहास की सबसे सरल व्यक्ति 

मेजर ध्यानचंद ने भारत को हॉकी में दिलाए थे तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक

लेखक भारत शर्मा ·

मेजर ध्यानचंद को हॉकी के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में सबसे महान माना जाता है। हॉकी के 'जादूगर' के नाम से मशहूर ध्यानचंद अपनी ड्रिब्लिंग और बाल पर मजबूत नियंत्रण के लिए विख्यात था। उन्होंने अपने दम पर भारत को 1928, 1932 और 1936 में तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाए थे।

हकीकत तो यह है कि 1936 में भारत ने फाइनल में ध्यानचंद की हैटि्रक के जरिए जर्मनी को 8-1 से रौंद दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने मैच खत्म होने से पहले ही एडॉल्फ हिटलर को स्टेडियम छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था।

उनके नाम पर 400 से अधिक अंतरराष्ट्रीय गोल हैं और उन्हें खेलते हुए देखने के बाद क्रिकेट के दिग्गज सर डॉन ब्रैडमैन ने कहा था कि वह क्रिकेट में रन की तरह गोल दागते हैं।

इतना सबकुछ हासिल करने के बाद भी इस दिग्गत खिलाड़ी ने 74 साल की आयु में निधन होने तक बहुत ही सरल जीवन व्यतीत किया था। वह 17 साल की उम्र में भारतीय सेना में शामिल हो गए, लेकिन न्यूजीलैंड दौरे के दौरान हॉकी पिच पर अपने शानदार प्रदर्शन के कारण उन्हें भारत लौटने पर लांस नायक की रैंक पर पदोन्नत कर दिया गया।

भारतीय हॉकी टीम के सदस्यों के साथ मेजर ध्यानचंद (नीचे से दाएं)

पूर्व भारतीय कप्तान जफर इकबाल को चंद से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, क्योंकि वे नई दिल्ली के वसंत विहार में एक ही कॉलोनी में रहते थे। उन्होंने कहा कि पद्म भूषण विजेता हमेशा पैसे के पीछे दौड़ने के बजाय उत्कृष्टता के लिए प्रयास करते रहे।

पूर्व ओलंपिक खिलाड़ी ने IANS को बताया, "वह खेल इतिहास के सबसे सरल व्यक्ति थे। उन्होंने कभी अपने लिए कोई पैसा या खुद पर घमंड नहीं किया। हम अक्सर बातचीत करते रहते थे।"

इकबाल ने एक पुराना किस्सा सुनाते हुए बताया कि इतने सारे पुरस्कार जीतने के बाद भी चंद कितने विनम्र और जमीन से जुड़े हुए थे।

उन्होंने कहा, "1978 में, हमने उनके साथ दिल्ली से झांसी तक की यात्रा की। अशोक (ध्यानचंद के बेटे) भी वहां थे। हमें वहां एक मैच खेलना था। हमें इंट थर्ड क्लास (जनरल कम्पार्टमेंट) मिला और यह पूरी तरह से पैक था। वहां बैठने तक के लिए जगह नहीं थी। इसके बाद भी ध्यानचंद खड़े रहते थे और किसी से कुछ नहीं कहते थे।"

उन्होंने आगे कहा, "कुछ समय बाद, हमने एक व्यक्ति से हमें बैठने के लिए जगह देने का अनुरोध किया। यह उसकी सरलता थी। हमारे पास प्रथम श्रेणी तक यात्रा करने के लिए पर्याप्त धन नहीं था, लेकिन ध्यानचंद ने कभी इसका विरोध नहीं किया।"

इकबाल का मानना ​​है कि हॉकी में चंद की विरासत को निर्धारित नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने उल्लेख किया, "हॉकी के क्षेत्र में देश के लिए उनका योगदान बहुत बड़ा है और इस पर हमें बहुत गर्व है। वह अपने खेल से पहचाने जाते हैं न कि पुरस्कारों से।"